“मुहब्बत की फर्श पर कुछ यूँ टूटा एक सच जैसे कोई सपनों की झालर नीचे आ गिरी हो… सब तरफ काँच के टुकड़े यूँ बिखरे, पर ना जाने क्यूँ मेरे पाँव की दहलीज़ पर आकर रुक गये…तुम्हारी नज़रों की तरह शायद उन्हें भी कुछ एहसास था…”
The idea is ki jis tarah tum nazrein nahi mila paayi and all that.. : )
PS: This wasn’t through any personal experience.. : )
